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दूरियां

एक सफ़र का आगाज़ किया था तुम्हारे साथ

हस्ते गाते अंजाम हासिल करेंगे ऐसी हुई थी बात

कुछ ही दूर चलते ही तुमको हमारी संगत पसंद ना आई

रास्ते की दूसरी और चले गये और बोले की अब ऐसे ही काटेंगे राहें

 

जाने अंजाने में इतनी दूरियां आ गयी है हमारे बीच में

तुम सड़क के ऊस तरफ से मुझसे कुछ कहती हो

बीच में शोर-ओ-गुल के चलते तेरे अल्फ़ाज़ कुछ खो जाते है

मैं अपने हिसाब से समझके इशारो से तुम्हे जवाब देता हूँ

पर तब तक तुम अपनी नज़र दूसरी और फेर लेती हो

 

इतने पास होने के बावजूद भी तेरे साथ का नसीब नही है

मैं फिर भी चलता रहता हू इस सफ़र में यही उम्‍मीद के साथ

की दूर चलके इस रास्ते के दोनो रुख़ मेलन-बा-मरकज़ हो जाये

तेरे मेरे सपने फिर से एक रंग हो जाये!!!

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